There are no items in your cart
Add More
Add More
| Item Details | Price | ||
|---|---|---|---|

निवेश की दुनिया में एक पुरानी कहावत है सबसे अच्छी कंपनी भी गलत वक्त में बुरे दौर से गुजर सकती है। एयर इंडिया के साथ वित्त वर्ष 2025-26 में ठीक यही हुआ। टाटा समूह ने जनवरी 2022 में सरकार से एयर इंडिया को 18,000 करोड़ रुपये में खरीदा था। देश को उम्मीद थी कि अब यह एयरलाइन फिर से पुराना रुतबा हासिल करेगी। तीन साल बाद जो आंकड़े सामने आए हैं, वे उस उम्मीद को एक कड़ा झटका देते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में एयर इंडिया को 26,700 करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा हुआ। यह टाटा के हाथ में आने के बाद का सबसे बड़ा सालाना नुकसान है। और यह आंकड़ा एयर इंडिया की अपनी घोषणा से नहीं, बल्कि उसके हिस्सेदार सिंगापुर एयरलाइंस की सालाना रिपोर्ट से सामने आया।
आमदनी भरपूर, फिर भी घाटा क्यों?
यहां एक दिलचस्प बात है जो निवेशकों को समझनी चाहिए। इसी साल एयर इंडिया की कुल आमदनी 79,150 करोड़ रुपये से ज्यादा रही। यानी कंपनी बड़े पैमाने पर कमा रही थी। लेकिन खर्चा उससे कहीं ज्यादा था। यह स्थिति तब बनती है जब बाहरी झटके इतने भारी हों कि कोई भी कारोबारी ताकत उन्हें संभाल न सके। और एयर इंडिया के साथ एक नहीं, पांच बड़े झटके एक साथ आए।
पांच मुसीबतें जिन्होंने मिलकर तोड़ा पहला झटका : आसमान बंद हुआ
ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने भारतीय विमानों के लिए अपना हवाई रास्ता बंद कर दिया। इसका सबसे ज्यादा असर एयर इंडिया पर पड़ा। यूरोप और उत्तरी अमेरिका की उड़ानें पहले पाकिस्तान के ऊपर से जाती थीं। अब उन्हें लंबा चक्कर काटना पड़ता है। जो उड़ान पहले 10 घंटे में पहुंचती थी, वह अब 15 घंटे लेती है। ज्यादा घंटे मतलब ज्यादा ईंधन, ज्यादा चालक दल का वेतन और ज्यादा रखरखाव। यह बोझ हर उड़ान पर पड़ा और पूरे साल में हजारों करोड़ जुड़ गए।
दूसरा झटका : ईंधन रिकॉर्ड ऊंचाई पर
पश्चिम एशिया की जंग ने कच्चे तेल के दाम आसमान पर पहुंचा दिए। विमान ईंधन की कीमत उस स्तर पर पहुंची जो पहले कभी नहीं देखा गया था। किसी भी एयरलाइन का सबसे बड़ा खर्च उसका ईंधन होता है - और जब रास्ता भी लंबा हो और ईंधन भी रिकॉर्ड महंगा हो, तो नुकसान दोगुनी रफ्तार से बढ़ता है।
तीसरा झटका जून 2025 का वह काला दिन
जून 2025 में अहमदाबाद के पास एयर इंडिया की उड़ान 171 दुर्घटनाग्रस्त हुई। यह भारतीय विमानन इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक थी। इस हादसे का वित्तीय बोझ 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये के बीच आंका गया है। यात्रियों का भरोसा हिला, उत्तरी अमेरिका के मार्गों पर मांग घटी और मुआवजे की देनदारी खड़ी हुई। चौथा झटका : रुपये की कमजोरी
विदेशी मुद्राओं में उतार-चढ़ाव और रुपये की गिरावट ने अलग से 7,000 से 8,000 करोड़ रुपये का नुकसान कराया। एयरलाइन के ज्यादातर बड़े खर्च विमान का पट्टा, ईंधन, विदेशी हवाई अड्डों पर शुल्क विदेशी मुद्रा में होते हैं। रुपया कमजोर हुआ तो ये सब और महंगे हो गए।
पांचवां झटका : नए श्रम नियमों का बोझ
सरकार की नई श्रम संहिता का पालन करने में 1,000 से 1,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आया। यह छोटी रकम नहीं है।
सिंगापुर एयरलाइंस : साझेदार को भी लगी गहरी चोट
एयर इंडिया में 25.1 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली सिंगापुर एयरलाइंस को भी इस घाटे की सीधी मार झेलनी पड़ी। सिंगापुर एयरलाइंस का अपना शुद्ध लाभ 57 फीसदी गिर गया। पिछले साल 2.78 अरब सिंगापुर डॉलर का मुनाफा था इस साल सिमटकर 1.18 अरब सिंगापुर डॉलर रह गया। यह गिरावट किसी भी निवेशक को चिंतित करने के लिए काफी है। कारण यह था कि सिंगापुर एयरलाइंस को अपनी हिस्सेदारी के अनुसार एयर इंडिया के घाटे का हिस्सा अपने खाते में दिखाना पड़ा। पिछले साल केवल चार महीने का घाटा उठाया था इस साल पूरे बारह महीने का। इसके अलावा पिछले साल विस्तारा और एयर इंडिया के विलय पर एक बड़ा एकमुश्त लेखांकन लाभ भी मिला था, जो इस साल नहीं था। फिर भी सिंगापुर एयरलाइंस ने साफ शब्दों में कहा कि वह एयर इंडिया में अपनी हिस्सेदारी से पीछे नहीं हटेगी। उनका कहना है कि भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते विमानन बाजारों में से एक है और यह निवेश लंबे समय में फायदेमंद होगा।
100 उड़ानें कम कठोर लेकिन जरूरी फैसला
घाटे के दबाव में एयर इंडिया ने एक बड़ा कदम उठाया। कंपनी ने अगले तीन महीनों में करीब 100 साप्ताहिक अंतरराष्ट्रीय उड़ानें कम करने की घोषणा की। इससे एयरलाइन की विदेशी उड़ान क्षमता में 27 फीसदी की कमी आएगी। दिल्ली से शिकागो, मुंबई से न्यूयॉर्क, दिल्ली से शंघाई, चेन्नई से सिंगापुर इन मार्गों पर अगस्त तक सेवाएं अस्थायी रूप से बंद रहेंगी। यूरोप में 12, ऑस्ट्रेलिया में 6 और दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में 68 साप्ताहिक उड़ानें घटेंगी। यह फैसला यात्रियों के लिए तकलीफदेह है। लेकिन निवेश की नजर से देखें तो यह समझदारी है। जो मार्ग लगातार घाटा दे रहे हों, उन्हें जारी रखना पैसे को आग में झोंकने जैसा है। एयर इंडिया हर महीने 1,200 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय उड़ानें जारी रखेगी यानी पूरी तरह हाथ नहीं खींचा गया है।
निष्कर्ष :
26,700 करोड़ का घाटा देखकर कोई भी निवेशक घबरा सकता है। लेकिन इस पूरी कहानी को ध्यान से पढ़ें तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखती है। एयर इंडिया का यह घाटा मुख्यतः उन कारणों से हुआ जो उसके अपने हाथ में नहीं थे। पाकिस्तान का बंद आसमान, युद्ध से महंगा ईंधन, एक बड़ा हादसा और रुपये की कमजोरी ये सब बाहरी झटके थे जो एक साथ आए। अंदर से देखें तो नए विमान आ रहे हैं, सेवाएं बेहतर हो रही हैं और बेड़े का नवीनीकरण जारी है। टाटा समूह और सिंगापुर एयरलाइंस दोनों ने अपनी प्रतिबद्धता नहीं छोड़ी है। दीर्घकालिक निवेशक जानते हैं कि बड़े कारोबार कभी-कभी तूफान में फंसते हैं। असली सवाल यह होता है कि उस तूफान में वे टिके रहते हैं या नहीं। एयर इंडिया अभी टिकी हुई है थकी जरूर है, टूटी नहीं।